इनकार

इस कदर मायूस था कि यार ने इकरार किया,

और ये समझा दिल-ए-नादाँ कि इनकार किया.

 

मेरे अश्कों ने किया था हाल-ए-दिल बयाँ मेरा,

औ सुकूत-ए-हिज्ब-ए-लब ने इश्क का इज़हार किया.

 

था अज़ाब-ए-दर्द-ए-जिगर ही मेरे मुक़द्दर में,

दिल ने शायद बेखुदी में भी तुम्ही से प्यार किया.

 

तू रहा मेरी आँख से ओझल मुदाम पर फिर भी,

हमने भी तेरा निगाहे-कल्ब से दीदार किया.

 

वो क्या जानेंगे कि लिखता है ग़ज़ल क्योंकर “अशोक”,

असर-ए-इश्क ने सदा-ए-दिल को ही अशआर किया.

 

(सुकूत-ए-हिज्ब-ए-लब = Silence of the shyness of lips)

(अज़ाब-ए-दर्द-ए-जिगर = Torture or curse of the pain of heart)

(मुदाम = Perpetual, निगाहे-कल्ब = Eyes of the heart)

(क्योंकर = कैसे, सदा-ए-दिल = Calls of the heart, अशआर = Plural of “sher”)

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