आजादी

आजादी

इस बस्ती का एक एक पथर
मुझ से बोल उठा ………
ये पथिक तू रुक जरा
दर्द हमारे सुनता जा ….. इस …

मेंडे बोले , खेत बोला ..
नदिया रोली, पर्वत बोला
सिले हुए है ओंठ सबके
दर्द के मारे चरखा कराह उठा !…इस

अंधियारे अभी भी है
अभी भी जुल्मुओ सित्तम
पहले एक था राजा ..
अब तो ( ७५० एम् पी ) कई किस्म
इनके मारो के दर्द से
बदन है मेरा थराह उठा .. इस…

क्या टूट गई है कड़ियाँ
जो थी कभी गुलामी की
क्या आज्जाद हो गये है हम
हम को तो ये भी पता ही नहीं
इनके कह्रो की कहर से
मन है मेरा कराह उठा .. इस…

राजतंत्र से प्रजातन्त्र में
बदला था जब देश …
चेहरे बदल गए थे
बदल गया था वेश
आज्ज़दी का भ्रम तो मेरा
तभी टूट गया था …..
जब गांधी के अनुयाउने
गांधी को हे लूट लिया
बचा न था कुछ भी पथ में
देख के सब उसको
ह्रदय है मेरा रो उठा .. इस ..

पराशर गौर १५ अगस्त ०४
१२ बजे दिन में

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