एकाकी पन

एकाकी पन

मत पुछो मुझ से
एकाकी पन क्या होता है
न गुजरे किसी पर ऐसा छण
मेरा मन ये कहता है !

दिखने मै तो वो यूँ
इस युगका लगता है
भावनाओ मै खोया खोया
वो तो , जड़-चेतन से उखडा रहता है !

जीवित है, वो जीबित है बस
इतना काफी है …………….
प्रशन पूछते हो अगर
जबाब उसकी आँखों में होता है !

चाह मरी होती है उसकी
द्रष्टि पथराई सी …….
संसार उखडा उखडा उसका
वो-तो बैरागी जीवन जीता है !

कभी कही अगर ……….
यादो की परत खुल जाए
पल भर के लिए नैनों में नया पन
पर , चेहरे पे तो ,
वो मौन को ओढ़े होता है .. मत .. पुछो …

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