मिलन

मिलन

रात ढ़लती गई, हम गुनगुनाते गये
शमा जलती रही, हम पिगलते रहे

रात घुटती गई, चाँद चमकता गया
हुस्ने-आग में खुद को जलाते रहे

लटा उड़ती गई, तारे झलकते रहे
रात भर गेसुओं से यूँ उलझते रहे

आँखें जगती गई, नशा छाता रहा
वक्त को थामने जाम छलकाते रहे

प्यास बढती गई, लब मचलते रहे
खुद को बचाने में खुद को डुबाते रहे

साँसे रूकती गई,चाँद छिपता गया
फूल खिलता रहा भँवरे गाते रहे

2 Comments

    • Gangaprasad Bhutra Gangaprasad Bhutra 16/02/2013

Leave a Reply