विस्तार…

आँख बंद की , ढूंढने लगा
डूबने लगा –
गहरे और गहरे
कभी रोशनी
कभी घुप अंधेरा
कभी तेजधारा झरने सरीखी
……..
भीगकर और गहरे में उतर जाता
नहीं आना चाहता बाहर विषम में
इस अद्भुत रोशनी में ठहरना मैं चाहता
अधिकार सुख की आकांक्षा मन में पाले
आस्था लिए बढ रहा हूँ
प्रकाश की ओर
मैं और डूबना चाहता
भीतर और भीतर जाना चाहता
तल-अतल सब पार करके
पहुँचना चाहता
मैं ‘मैं’ से आगे निकलना चाहता
बहुत आगे
जहाँ भाव अभाव का भान न हो
न रहे प्यास
न टीस कोई
मैं इस तरह विस्तार पाना चाहता हूँ

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