पीड़ा

मेघ बहुत है मन मेँ मेरे,
ऐसे ही कैसे बरसा दूँ इनको
दर्द दबा है कंठनाल मेँ,
आंखो से कैसे छलका दूँ इनको।
मन मंदिर की भग्न मूर्ति
अब मुझको ताने देती है,
खुद ही खुद से उलझ रहा हूँ,
कैसे उलझन दिखलादूं सबको।
दूर क्षितिज पर लाली निगलने,
कलप रहा है स्याह अंधेरा,
डूब गया सूरज लाली का,
कालिख से कौन बचाए इसको।
तन की पीड़ा घनीभूत हो,
मन मेरे को सींच रही है,
अश्रुपूरित स्नेहिल आंखे,
इस पीड़ा को सींच रही है,
पीड़ा का स्वर सुनाऊँ किसको,
मैं ये दर्द दिखाऊँ किसको।

मनोज चारण
मो. 9414582964