कुछ शे’र मार रहा हूँ…

“तुझे पा ना सका, ये ग़म है मुझे,
तेरा नाम मगर, मरहम है मुझे…”

“ना कर इतना गुमां, पलकों पे मेरी, चढ़ के तू ऐ अश्क,
कि चढ़ आया है नज़रों में, तो तू उतर भी सकता है…”

“ना पूछिये, है कितना असर, मेरा मुझपर,
मैं ऐसा दर्द हूँ, जो खुद पे भी बेदर्द रहा…”

“इक आरजू है, कि आरजू ना रहे,
बहोत किया है ख़स्ताहाल, आरजू ने तेरी…”

“इस रफ़्तार से चलता है, दुनियां का कारवां,
दो पल पुराने ग़म भी, ठहरते नहीं पल भर…”

“ज़ज्बात-ए-जिस्म के तजुर्बे लेकर,
आखिरश रूह की दुनियां में आना ही पड़ा…”

……..आगे भी ज़ारी रखूँगा…

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