सुधीर मौर्य की तीन कविताय

ho na ho Poems

 

न रक्स रहा न ग़ज़ल रही…

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इश्क के थाल में

चाँद सज़ा कर

बाज़ार में बेच दिया

कल उसने…

 

सपनो का एक टुकड़ा था

जिस संग ज़ीस्त बितानी थी

तोड़ के उस सपने को

नैनं कर दिए सजल उसने…

 

रक्स उस दोशीजा का

मैंने रात चांदनी देखा था

पायल की झंकार पर

गाई मेरी ग़ज़ल उसने…

 

न रक्स रहा न ग़ज़ल रही

हाय जफा ही काम आई

भूल के प्यार गरीबों का

अपनाया महल उसने…

 

कैसी ही है मेरी प्रियतमा  

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चंद्रमा रे चंद्रमा

कैसी ही है मेरी प्रियतमा

आती जो होगी वो अटारी

नाचतें तो मोर होंगे

उसके होठों की खनक पर

कोयलों के शोर होंगे

 

सूर्य की ऐ आरुनिमा

कैसी ही है मेरी प्रियतमा

 

सूरज चुराता होगा रंग

अधरों के उसके लाली से

रोशनी तारों में आई

उस बदन की दीवाली से

उसके खातिर फूल मांगे

प्रकृति ने बनमाली से

 

ओ जमी ओ आसमा

कैसी ही है मेरी प्रियतमा

 

उस शहर उस गावं में

जुल्फों के उसके होंगे बादल

बहती होगी ठंडी हवा

जो उड़ता होगा उसका आँचल

लाज आती होगी घटा को

लगाती होगी जो वो काजल….

 

 प्रीत का रंग…

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इन दिनों

पलाश सा खिला है

चेहरा उसका…

 

कोयल सी कुहक है

होठों पे उसके…

 

झील सी आँखें करती हैं

अठखेलियाँ उसकी…

 

खिलने लगी है

चंद्रिमा पूनम की

गालों में उसके…

 

हिरन सी लचक है

चाल में उसकी…

 

लगता है जेसे

अवतरित हुआ है मधुमास

शरीर में उसके…

 

हो न हो…

चड़ने लगा है उसपे

प्रीत का रंग किसी-

का

इन दिनों…

 

सुधीर मौर्य के कविता संग्रह ‘हो न हो’ से 

One Response

  1. CB Singh 11/02/2013

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