बिरह

बिरह

मेरी कलम लिख रही, “बिरह” मधुमास का,

मन मुरझाया, खिला फूल जब अमलतास का,

चली जब बसंती पवन,पलाशों सा मन दहका,

गमगीन कोयल भी गाये गीत मेरे बिरह का ,

भवरें सी तान मे खुले बंध कोपल कलियों का,

धड्कन मे बजता गीत जैसे मन की हसरत का,

सासों मे बजे लय घुंघरू सा खनकते दिल का ,

मन मे घुटती आहें छेड़े राग जल-चातक का ,

फ़ागुनमे बरसा जैसे लहू-रंग मेरे अरमानो का,

कसमसाने लगा मन सर्द हवा मे ज़र्द पत्तों का,

बिरह की गर्मी से झुलस गये पंख तितलीयों का,

खोजे मन वावरा रिमझिम सा मिलन सावन का !

सजन कुमार मुरारका

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