खिलाफ़त

खिलाफ़त

दिल का रोशन चिराग,”ज्लवा”, क्या करे मनाने;
दिल परवाना दस्तक दे, ख़ैरियत के ही बहाने |

उनका क्या कसूर ,आए ख़ुद मज़ाक अपना बनाने,
बेफिज़ूल इल्ज़ाम है, आग मे जलने आते परवाने|

प्यार के सौदागर वह, हम आते बे- भाव बिकने ,
चमन तो खिलता है, तितलियों के दिल लुभाने |

मासूम से गिरा कर बिजली किया – खाके-चमन ;
किस जुर्म की कलियों को सज़ा देगें, आँसू है बहाने|

खिलते फ़ूलों के वास्ते घूमते भंवरें, जाते मंडराने :
कर डालते क़त्ल नज़रों से,इशारों के कातिल नज़राने|

फ़कत नाज़ुक सा दिल, ले जाते क्यों ज़ालिम से तुड़ाने,
जी में आए सोच ले आख़िर किसी के वास्ते बिन जाने |

ज़ोर नहीं, थोड़ा ग़ौर हम पे,”ढोर” नहीं है समझाने मे,
ज़ाहिर उनके खिलाफ़ ज़ुल्म का शोर नहीं देगें उठाने|

सजन कुमार मुरारका

Leave a Reply