अनायास सी याद ……!

अनायास सी याद ……!

अनायास ही मन ने चाहा;
शिलालेख पर अंकित शब्दों सी,
पुरातन और धुंधले,
ना समझ आनेवाले हरप,
कौशीश पड़ने और-
सार्थक हो जाती;
भूली बिसरी याद,
उभर आता तुम्हारा नाम ।

अनायास स्मृतियों के,
बादल जैसे अन्दर सहज़;
उमड़ उमड़ टपकाने लगता,
गम्भीर जल-कण;
बूंद-बूंद बीते हुए क्षण,
समाया हुआ सारा पल-
अनायास ही बहने लगता;
बिन रोक-टोक,उद्दम-उदंड,
ओर-छोर परवाह विहीन,
ड़ूण्डने लगता तेरा मुकाम|

अनायास कँटीली डालियां सा;
शब्दों के वह कठोर,
आदान-प्रदान,चुभने लगते-
कोमल मन मे,जैसे;!
चुभे थे,तुम्हारे लिए गुलाब-
तोड़ते वक्त, पर वह चुभन;
मीठी-मीठी, यह दर्द से,
जीना कर रही हराम|

अनायास सोच के फेर से,
कुछ भी सोचा जा सकता;
कंही भी,कुछ भी, मगर,
तुम्हारे बारे मे सोच-
अंकुरित होती मन की भूमी;
सूखे बीज अंकुरण होते,
और एकाएक लहराने लगती,
फ़सल बोई-अनबोई तमाम|

अनायास प्रेमियों के किस्से;
लोकगीत से निकल बाहार,
करने लगते दरबार, उनका हुनर;
जो बन सकते,मेरे किस्से!
अनायास स्मरण मे आता,
इनके शब्द, भाव और अर्थ;
मेरी आपबीती का ताम-झाम |

अनायास फफोले पड़े हाथ,
तराशते वह क्षण,जब-
उसके हाथ पकड़े घूमना;
हाथों मे हाथ, स्वप्निल-स्वप्न,
ज़ीवन भर का साथ,
छुट गए हाथ थामे-
हुए नाकाम………!

अनायास आँखों को छुपाते,
आँचल मे क़ीमती आँसू,
मोतियों की तरह,
निकलते है;
हर बात का अर्थ-उमड़ आते,
जिससे बदल जाते हैं मौसम ।

अनायास ही तुम्हारी यादें ,
जीवन्त हो, ज़्वाला धधकाती;
जैसे सुलगती है चूल्हे की आग,
और इठलाती है भस्म कर;
मेरा एकांत, धुंवा-धुंवा सा,
फैलता, बोझिल होता मन!
आँख मलकर देखा-
तुम इठला रही हो बेशर्म |

अनायास ही लिख देता हूँ-
विरह की कविता;
और गुनगुनाता हूँ-
संगीत के सुरों-से सज़ाकर!
सब कुछ….;
तुम्हारे नाम……|

सजन कुमार मुरारका

(“अनुज लुगुन” द्वारा लिखित “अनायास” के अनुकरण मे लिखित )

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