आहों से रिसती गज़ल

आहों से रिसती गज़ल,

हमदर्द समझ के एतवार था, उसका किया करे,
हक जतलाकर , सितम वेवाफाई का हम पे करे;
वह जिए ज़िन्दगी, हम जिंदा-लाश, वह क्या करे ;
खाक मे सिमटे अरमान,जर्र-जर्र से हालात, क्या करे;
मालूम न था, बदगुमानों से इश्क का नतीज़ा,क्या करे,
किसी सूरत से, दिल को करार मिले, लाचारी क्या करे,
और ज़ुल्म सहने की ताकत नहीं हम मे, अब क्या करे;
तस्वीर उनकी तकदीर माना, एब है हम मे, क्या करे ;
दिल की दवा समझा, जिसे, बन गई जहर, क्या करें ;
प्यार की हकीकत, कोई शिकायत नहीं, क्या करे ;
शामे जिंदगी कि तन्हा, काली रात है, हम क्या करे ?
हमारे जीते जी, किसी की हो जाए, बरदास्त कैसे करे !
ना-उम्मीदी में भी उम्मीद, नादान दिल का क्या करे ;
हर इन्तिहां से गुजर जाएँ, अगर “वफ़ा” हम पे करे ,
या नाज होगा हमको, उनकी रुसवाई से, हम जो मरे !
फैलाया अँधेरा गम का, हुस्न से रोशन, वह क्यों करे ?
नज़रें यों न मिलाए, पलकों पे बिठा हल्लाल जो करे ;
प्यार का दस्तूर, उनकी शोहरत में गुस्ताखी कैसे करे ?
मेरी ज़िन्दा-लाश से आह भी न निकले वादा हम करे !
आहों से रिसती गज़ल,खामोशी से प्यार पे निछावर करे|

सजन कुमार मुरारका

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