अधखिली धूप

आज अचानक बैठे-बैठे,
यूंही कुछ कहते-कहते,
मुझे शाम घेरे थी,
अंधेरी चाँदनी डाले डेरे थी,
पर मन में थी उजियाली छायी,
लग रहा शायद तू चली आयी,
ना आयी तू पर आया,
तेरा सपन सुहाना,
बिखरी लटें, पलकें थी मुँदी,
लेटी तू कुछ उनींदी सी,
अधर तेरे कुछ बोल रहे थे,
शायद मन मेरे को तोल रहे थे।
रात बीत गयी कैसे थी,
मैं नहीं जानता, फिर भी,
तेरी याद संजोकर बीती शायद,
सुबह हुई कब,
नहीं पता चला कुछ,
दिनकर ने स्पृश कर,
कर से,
छुआ मुझे तो पता चला,
तंद्रा टूटी हुई,
दूर खुमारी,
देखा सुबह थी न्यारी-न्यारी,
अधखिली धूप फैली थी चहुं दिसाकास,
पर मन मेरा कुछ था उदास,
यूं रात फिर बीत गई,
सुबह !
तेरे बिन धुंधली थी,
या आँख मेरी अधखुली थी,
जो भी था,
पर था जरूर,
तू रही क्यों इतने दिन दूर,
अब सहन नहीं होता तड़पना,
बन जाओ हकीकत कल्पना।

मनोज चारण
मो. 9414582964

2 Comments

  1. CB Singh 11/02/2013

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