बंजर सी शाम

एक-एक कर दिन कितने,
ना जाने कैसे बीते, सुबह हुई तो शाम छिपी,
और दुपहरी कैसे बीती।
ना याद रहा अब तो वह पल,
आखिरी बार मिली थी नजरें कब,
वो शाम सुहानी, बंजर सी,
चुभती है उर में खंजर सी,
जब याद उसे मैं हूँ करता,
अनायास बहती है आंखे,
ना जाने मेरी कल्पना,
कब आयेगी लगा यथार्थ की पांखे।
दिन-दिन बीत रहा है जीवन,
ढलती जा रही आशाएँ,
अभिलाषाए अधूरी है,
ना जाने कैसी दूरी है,
करता हूँ रोज मजबूरी से जंग,
हो गया हूँ बेहद तंग,
अब तो चैन तभी आयेगा,
मन जब मंजिल पायेगा।
याद है बस वो श्मसान,
जिसे देख टूटता है अभिमान,
रोज सुबह जवां होती,
पर ढल जाती बनकर
ये बंजर सी शाम।

मनोज चारण
मो. 9414582964

2 Comments

  1. yashoda agrawal 08/02/2013

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