रावण अजर है अमर है

रावण सदियों से जलता आ रहा है, अभी कुछ रोज पहले भी जला है, लेकिन आप सबने मिलकर उसकी हंसी को बंद कर दिया है, मगर रावण आज भी मुझे हंसता हुआ , अट्टाहस करता हुआ प्रतीत हो रहा है, उसकी आँखों में एक नई चमक है क्योंकि उस 55  फुटे रावण का स्थान अब पांच दशमलव पांच फुट के रावण ने ले लिया है और यह साढ़े पांच फुट का रावण उस 55  फुट के रावण से कहीं अधिक खतरनाक है.चेहरे पर राम के जैसा तेज, वैसी ही मुस्कुराहट, हाथ आशीर्वाद के लिए स्नेह से उठा हुआ मगर मन के अन्दर कहीं एक रावण अंगडाईयां लेता हुआ छिपा बैठा है. उसकी आँखों में सीताओं के प्रति वासना की निगाह चमक रही है. जब उस 55  फुट के रावण को जलाया जाता है तो एक ख़ुशी का एहसास होता है. जब हिंसा के पुजारियों, मजहब के ठेकेदारों ओर धरम-अधिकारियों द्वारा देश को जलाया जाता है तो वह साढ़े पांच फुट का रावण अट्टाहास करता हुआ नजर आता है ओर लगता है कि जैसे वह कह रहा है :-

हजारों लाखों वर्षों से मैं जीता आया हूँ ओर जीता रहूंगा,

क्योंकि मैं अमर हूँ

हजारों लोग रोज मारा-मारी करतें हैं – चोर बाजारी करतें हैं अपना पेट भरते हैं पर जीते हैं,

मैं भी बस कुछ इसी तरह से जीता हूँ,

मैं ही जानवारों का चारा खाता हूँ – भाई को भाई से लङवाता हूँ,

अपने ही बापू पर गोली चलवाता हूँ ओर माँ की ममता का लहू पीता हूँ ,

बस कुछ इसी तरह से जीता हूँ,

मैं ही हूँ जिसने पुरे हिन्दुस्तान में फैलकर हद कर दी है,

मैं ही हूँ जिसने इंसानों की जिन्दगी कीड़े-मकोड़ो से भी बदत्तर कर दी है,

मैं ही हूँ जो हैवानियत का चोला पहन कर इंसानियत को निगल जाता है,

मैं ही हूँ जो हिन्दु-मुस्लिम-सिख-इसाई सबका कत्ल करवाता है,

जब मरता है कोई मुस्लिम तो मैं कुरान ओर जब मरता है कोई हिन्दू तो मैं गीता हूँ,

बस कुछ इसी तरह से जीता हूँ,

मैंने ही मंदिर मस्जिद चर्च पर हथियार उठाया ,

मैने ही बेटे से बाप का कत्ल करवाया,

मैंने ही चंद्रशेखर की मुखबरी की, मैंने ही पटेल को लाठी मारी,

मैंने ही बसंती चोला फाड़ा, मैंने ही भगत सिंह को फांसी लटकाया,

मैं ही हूँ जिसने दुर्योधन की बुद्धि भ्रष्ट कर उसे उकसाया,

मैं ही हूँ जिसने सतयुग में चीर हरण करवाया,

मैं ही हूँ महाभारत का रचियता जिसने इस धरती को खून से नहलाया,

मैं ही हूँ मंथरा, मैं ही कैकयी जिसने श्री राम को बनवास करवाया,

बदनियती की आग में सच्चाई को सदा जलाता आया हूँ ,

बस कुछ इसी तरह से जीता आया हूँ,

मैं ही हूँ जिसने इंसान बन कर शैतान से साक्षात्कार किया है,

मैं ही हूँ जिसने नेता बन कर कुर्सी से बलात्कार किया है,

मैं ही हूँ जिसने झूठा वायदा किया, झूठा आशवासन दिया है,

मैं ही हूँ जिसने किया है विष मंथन ओर खुद अमृत प्याला पिया है,

अमृत के प्याले में हैवानियत का विष घोलकर सभी को पिलाता आया हूँ,

ओर हजारों लाखों वर्षों से इसी तरह से जीता आया हूँ,

और जीता रहूंगा,

क्योंकि मैं अजर हूँ अमर हूँ.

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गुरचरन मेह्ता

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