खुद से बातें करती हूँ

कभी कभी खुद से बातें करने को जी करता है,

कभी – कभी ख़्वाबों मुझे हाय रहने
को जी करता है
जिंदगी हर लम्हा बदलती है बजी
रंगों  में मेरे जाने को जेईई करता है बजाई
दरवाजा मंजिल है और सफर भी मुश्किल
पर एक पल मुझे हाय मंजिल फलक को जेईई करता है

महफिल मुझे फ़ैली हो प्रहार
खामोशी हर तरफ
फिर तन्हाई मुझे हाय रहने को जेईई कर्ता है
खुशियों की दूकान मुझे मिलती हैं खुशियाँ नकली
मुफ्त के गम हाय फलक को जेईई करता है अब
तमाम उमर मुझे जो मुमकिन ना हो
वो सब कुछ फलक को आदमी करता है
कभी कभी खुद से पीटा करने को जेईई कर्ता है
कभी कभी ख़्वाबों मुझे हाय रहने को जेईई करता है

One Response

  1. SUHANATA SHIKAN SUHANATA SHIKAN 19/02/2013

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