चारण हूँ मैं !

चारण हूँ मैं,

तीन अक्षरों का मेल, तांडव को करता धारण हूँ मैं,

करता हूँ खुद व्याख्या अपनी,

चारण हूँ मैं।

चोदह विद्याओं में पारंगत,

च  से   चतुर्वेद    का   ज्ञाता,

च  से   चंडी   और    चामुंडा,

च  से  चटपट  छन्द बनाता,

च से चालकनेच का चेला,

देविसुत विरुद करता धारण हूँ मैं,

चारण हूँ मैं।

र से रिद्धिपति का गुरु मैं,

रण में विकट रूप धरूँ मैं,

र से राम के जो आराध्य,

वो  हैं  मेरे  भी   आराध्य,

र से  रज भव के चरणों की,

जगत में शिव-शक्ति के कारण हूँ मैं,

चारण हूँ मैं।

ण  नहीं   है  मात्र  एक अक्षर,

छिपा है इसमे सकल चराचर,

विष्णु      और        नारायण,

प्रणाम   और    परिमाण भी,

छुपा हुआ है ण में सारी सृष्टी का निर्माण भी,

चारण नाम पाया चरणों से,

माँ के चरण करता उर में धारण हूँ मैं,

इसीलिए तो चारण हूँ मैं।

चारण हूँ मैं।

 

मनोज चारण

रतनगढ़

मो. 9414582964