भूल न जाना

नए साल में भूल न जाना
बीते साल का जख्म पुराना
दामिनी की वो दर्दे कहानी
लाइ थी एक हवा तूफानी
आक्रोश की आंधी थी जिसमे
था बहती आँखों का पानी
वो चीख अभी भी पुकार रही है
इन्साफ की गुहार लगा रही है
वो दर्द अभी भी जिन्दा है
इंसानियत आज भी सर्मिन्दा है
नए साल के इस मौके पर
संकल्प करें सारे मिल कर
किसी सड़क या चौराहे पर
और ना हो कोई दामिनी ऐसे दोराहे पर
मिल कर आओ ये प्रण करें
ये साल नारी जीवन को समर्पण करें – प्रीती श्रीवास्तव

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