तो जानें

तुम्हारी बातों से है सीना मेरा छलनी-छलनी,

जख्मे दिल पर कभी मरहम लगाओ तो जानें,

गर तुम्हे है डर कि मैं महफ़िल ख़राब कर दूंगा,

शमां महफ़िल की कभी बन कर दिखाओ तो जानें,

बीती बातों को भुला कर अपने दिल से,

लबों पर कभी हंसी के फुल खिलाओ तो जानें,

के मेरे शरीर पर तुमने अपना दावा तो कर दिया,

पर अपने मन को कभी हमारे मन से मिलाओ तो जानें.

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तुम्हारे शबाब में है सुरूर कितना ये आजमाना चाहते हैं,

मस्त आँखों से कभी पिला कर देखो तो जानें,

अंधेरी रात में मांगता है चाँद भी रोशनी तुमसे,

तुम बस तारों की तरह कभी झिलमिला कर देखो तो जानें,

के सात परदों में तुमने खुद को कर लिया है कैद,

अरे ! पर्दा चिलमन से कभी उठा कर देखो तो जानें,

इतने समय में दूरियां कितनी बढ़ गई हैं,

इन दूरियों को कभी मिटा कर देखो तो जानें.

 

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रुलाया है कितने ही लोगों को इस जिन्दगी में,

खुद आंसुओं की धार में कभी बह कर देखो तो जानें,

ऊँचे-ऊँचे महल ओर मखमली बिस्तर हैं आपके,

गरीबों की बस्ती में कभी रह कर देखो तो जानें,

के झूठ के सहारे ही पुरी जिन्दगी गुजार दी,

आईने के सामने कभी सच कह कर देखो तो जानें,

और सच कह भी दो तो कोई बड़ी बात नहीं,

हमारी तरह कभी सच कह कर देखो तो जानें.

 

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फरहाद को मिली थी शिरी ओर महिवाल को सोणी,

इस रांझे के लिए खुद को कभी हीर बना कर देखो तो जानें,

के तुम्हारी जिन्दगी के रास्ते में हूँ मैं एक मील का पत्थर,

हाँ ! पत्थर पर कभी लकीर बना कर देखो तो जानें,

ये माना कि भर देते हो रंगों से तुम हर चित्र को,

पानी में कभी तस्वीर बना कर देखो तो जानें,

सुना है नींद आते ही खो जाते हो मीठे-मीठे सपनों में,

अरे! ख्वाबों में कभी तकदीर बना कर देखो तो जानें.

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गुरचरन मेह्ता

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