चाँद जैसे चेहरे पे तिल जो काला काला है – GAZAL SALIM RAZA REWA

            ग़ज़ल
चाँद जैसे चेहरे पे तिल जो काला काला है
मेरे घर के आंगन में सुरमई उजाला है !

जब भी पाव बहके हैं गर्दिशो की ठोकर से
उसके दस्त ए नाज़ुक ने बाँहों में सम्हाला है !

ज़िन्दगी में मेरे तो हर तरफ अँधेरा था
आप ही के आने से हर तरफ़ उजाला है !

अब कहाँ सदाकत है इन हसीन लफ़्ज़ों में
दोस्ती वफ़ादारी मकड़ियों का जाला है !

उसकी शोख़ नज़रों ने ज़िन्दगी बदल डाली
राह में मेरे अब तो प्यार का उजाला है !

पल में जिंदगी दे पल में जिंदगी ले ले
कैसे उसको हम समझें खेल ही निराला है !

मैं तो गिर गया होता रास्ते के ठोकर से
उसकी जुस्तजू ने ही ऐ “रज़ा” सम्हाला है !
10.12
SHAYAR SALIM RAZA REWA MP

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