आधुनिक एकलव्य कथा

आधुनिक एकलव्य कथा / डॉ. कर्मानंद आर्य

तो क्या-क्या बताऊँ महाराज!
असगुन कथा सी
लम्बी उसांस भारती है कंक्रीट

मेरा जन्मना
है एक पथभ्रस्ट शहर की तरह
जो देखने में तरक्कीपसंद
किन्तु परंपरा में दकियानूस है

कंगूरे की नीव पाटते-पाटते
जहाँ दबी हैं मेरे पूर्वजों की अस्थियाँ
माँ के खून से जहाँ रंगी गई हैं दीवारें
सफ़ेद ग्लोब में
जहाँ मेरे बचपने ने अपना घर होने का सपना देखा है

महामहिम ! मालिक के लालगुझौवा अमरुद पेड़ों पर
लटकी हुई है मेरी भूख बैताल सी
चमरौधे जूते की फटी बिवाईयों में झांकती रही है गरीब सर्दी
मैंने जीने के सारे हक़ अदा किये हैं
डरे पिंजड़े की बंद काया भीतर

क्या करूँ महाराज!
मर जाती है संवेदना, बौने हो जाते हैं शब्द
कुत्ते रोते हैं अँधेरी गलियों भीतर
जब मूल्यांकन होता है मेरे अस्तित्व का
जब जाति का शेर दहाड़ता है
पैरवी में ऊपर से चिट्ठी आती है

जातीय परंपरा में प्राप्त, सिर्फ क्षणिक आक्रोश होता है
संवेदना में समझाते हैं मेरे डरे पुरखे
कोई नई बात नहीं, कहे जाने वाले भगवान?
पुरषोत्तम राम ने जातीय छल किया था
ओढ़ी थी धर्म की चादर
निरीहों को मारा था जातीय छल से

आज समय पत्थर हो गया है
दर्द दुखता है नीली धमनियों में

आरक्षण मध्यमवर्गीय सवर्णों के विमर्श का विषय है
वो उसी तवे पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं
जिसकी आग बुझी नहीं है
धर्म जल रहा है, राख हो रही है संवेदनाएं
उन्हें बनाना है पैसा

क्योंकि सारी शक्ति उनके हाथों में है
उनकी मजबूत साजिस सफल है, नॉट फाउंड सूटेबल के बाद
और भी कई बहाने हैं
एटोटाईज, री एटोटाईज
सरकारी नौकरी में सिर्फ दो प्रतिशत

आरक्षण मेरे लिए नौकरी है
क्योंकि मैंने भोगी है आरक्षित होने की पीड़ा

स्वयं को स्थापित कर पाना कठिन है
यह कोई विद्रोह नहीं
स्वयं पर कविता लिखने की साजिस है
स्वयं की मूर्तियाँ बना हँस रहे हैं हम

किये कराये की लम्बी सूची दर्ज है महाजनी खाते में
कैसे सुनेंगे आप अधूरी कथा बिना भोगे दुःख
एक मिथकीय संवेदना के साथ
उनके बनाये जाल, मेरी जिन्दा साँसों के लिए

अंगूठा नहीं, कैसे काटी गई हैं मेरी पांचो अंगुलियाँ
यदा-कदा रिसता है उनमें खून
पर मैं हारा नहीं हूँ महामहिम
मेरे जबड़े अभी भी सलामत हैं

One Response

  1. CB Singh 31/01/2013

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