तीन स्मृतियाँ

तीन स्मृतियाँ / डॉ. कर्मानंद आर्य

समय के सहचर
मेरे तीन गुरू, माता पिता आचार्य

स्कूल जाते हुए मेरे पिता ने
पहली शिक्षा दी
तुम्हे कोई जाति सूचक शब्द कहे
बीजार, चूहड़ा, या चमार बताये
मारे गरियाये/ प्रतिवाद मत करना/ सह लेना
क्योंकि वो मुझे पढ़ाना चाहते थे

मेरी माँ
चक्की बनी पीसती उनका आटा
करती हरम की मेमों की मालिश
बमुश्किल लाती थोड़ा अन्न / पानी पी फाकें मार सो जाती
ताकि मेरी किताबें आ सके

गुरू ने बेहद अहम् भूमिका दी जीवन की
सबके सामने अक्सर पूछते थे वे मेरी जाति
झाड़ू लगवाते, पुछ्वाते मेजें
तुम चमार पढोगे तो काम कौन करेगा
देते नसीहत
संवेदनशील हो पढ़ाते हिंदी मुहावरे

आज मैं पढ़ लिख गया
तीन स्मृतियाँ चौथे का गला घोंट रहीं हैं

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