डॉ. कर्मानंद आर्य की कवितायेँ

उनके घर का पानी मत पीना / डॉ. कर्मानंद आर्य

तीन हजार साल पहले
मेरे पूर्वज नहीं गांठते थे जूते
नहीं करते थे बेगारी
वो दास नहीं थे, न ही रहते थे दक्खिन टोले
ज़र, जंगल, जमीन
सब पर था उनका बराबर हक़

कहते हैं पाप का घड़ा फूटा
हड्डियों से रिसने लगा तेजाब
चौधरी बने चौहद्दी पर खड़े राक्षसों ने
लूट लिए खेत
बंजर कर दिए संसाधन

आज भी मेरे पूर्वज जूते नहीं गांठते
न ही करते है हरवाही
अब वो गुलाम भी नहीं
वो आम आदमी की तरह सोचते विचारते हैं

पड़ोस वाली आंटी कहती हैं

उनके घर मत जाना
उनका दिया मत खाना
उन्हें घर किराये पर मत देना

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