कर्तव्य का निर्माण

कर्तव्यों से भी बडे कर्तव्य है, उसी को निभाओ.     बन्धनों मे बँधकर, वास्तविक जीवन का कर्तव्य न भूल जाओ.        जीवन बना किसलिए? इसका उत्तर ढूंढ निकालो.     जीवन की जो परिभाषा है, उसी पर रथ ले जाओ.     यदि बन्धनो ने बाँध, लिया होता सृष्टिकर्ताओ को.     तो आज सृष्टि नही होती, सुन्दर दिखलाने को.    मृत्यु से पहले जीवन है,जीवन के बाद मृत्यु.      जब जीवन बीता नही किसी निर्माण में, तो किस काम की वह मृत्यु.    हे! निर्माण करने वाले, बन्धनो को तू तोड दे.  सृष्टि के लिए तू बना हैं, मिथ्याओं को छोड दे.. निष्क्रिय हो गया जब तू, समझ जीवन व्यर्थ हुआ. निर्माण का सुख पाले, वहीं जीवन परमार्थ हुआ.. सुख सपने देखे तूने, आखिर जीवन मे कितने? सुख की आशा जब तूने की, तो दुःख के घडे भी थे, तूझे रितने. तू आया संसार मे मात्र निर्माण हेतु, बंधन तो टूट जाते हैं, मृत्यु के बाद, पर निर्माण बनते जीवन का सेतु, आज उन्हीं निर्माताओं का जन-जन मे लहर रहा हैं केतु. सृष्टि की प्रथम नींव, पडी थी तेरे कदमों से. बंधन तोड, कर निर्माण उपवन का, खिलखिलाते पद्मों से..

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