महफिल

शरिफो कि बस्ति से हि
महफिल सजाई जाती
दुपट्टे खिच महफिल मे
नुमाइस कराई जाती।।
कडवी रात जी के
बिदाइ कराई जाती
बन्दी बनाके हुश्न को
रीहाई कराई जाती।।
छलकते जाम उनको
बस पिलाई जाती
बोलि लगा के हमको
अर्थी बनाइ जाती।।
घिनौनी उन हर्कतो पर
आबरु लुटाई जाती
पलको मे आँशुवे है
पर  मुस्कुराई जाती।।
दुल्हन छोड आए घर पे
यहाँ मोहब्बत जताई जाती
शरिफो के सामने फिर
आबरु लुटाई  जाती।।
गमे छुपाकर अपनी
खातिर कराई जाती
दरवाजे खुली है हरदम
बे वक्त उठाई जाती।।
रोउं कहाँ मै जाकर
हसना सिखाई जाती
होठो पे हसी रहती
पलके भिगाई जाती।।
शरिफो कि बस्ति से हि

महफिल सजाई जाती
दुपट्टे खिच महफिल मे
नुमाइस कराई जाती।।
हरि पौडेल

 

2 Comments

  1. rushabh shukla 25/01/2013
    • Paudel Paudel 28/01/2013

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