सारे जहाँ से अच्छा

न वेद-पुराण कभी सुनता-सुनाता हूँ

न रामायण में ही कभी ध्यान लगाता हूँ

न गीता का पाठ कभी पढ़ता-पढ़ाता हूँ

न किसी भजन में ही रमता-रमाता हूँ

जब भी मन होता है ऐसे किसी काम का

बस “सारे जहाँ से अच्छा “ गीत गुनगुनाता हूँ

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गुरचरन मेह्ता

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  1. CB Singh 24/01/2013

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