तबाही

तबाही
तबाह होने से पहले भीतर की चुभन लगी सिमटने
गिडगिडाती आत्मा ….
परखच्चो सा ढांचा चाहने लगा जिन्दगी
मौत सही पर तबाही नहीं

टूटते फांसलों के कुछ खण्डहर
ढूह भर रह गयी चिता जलकर
ख्वाब ढल जाये तो सुबह निकले
चलता है साथ राज कोई दबी ख्वाहिशेां का
जलता चिराग….. लपलपाता
कौन जाने कैसे थमें ये मंजर
ये खेल

दम भरते चलते हैं नाम ले के जिन्दगी का
कहाँ ?…दफन होने की फुर्सत
और जलकर खाक होने का होसला
अब तो तबाह होने से पहले
तबाही की वजह सोचना भी दुर्भर
पुरानी बात याद बन याद आती
तबाही कदम-दर-कदम बढ जाती
सामने तडपती चीख औ’ पुकार
तबाही न लेती रुकने का नाम

-सत्येन्द्र कात्यायन ‘सत्या’

2 Comments

  1. CB Singh 24/01/2013
    • SATYENDRA KATYAYAN satyendra katyayan 27/01/2013

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