हुस्न कि हुर

हुस्न कि वह हुर थी 
जो कहर ढाह कर 
चलि गई 
दिल कि बातें कहते उनको 
पर मुस्कुराकर 
चलि गई 
आई थी वो माशुम बनकर 
और शहर हिलाकर 
चलि गई 
महफिल मे आई कुछ ऐसी अदा से 
और छम छमा कर 
चलि गई 
सबको उसने घायल करके 
नजर बचाकर 
चलि गई 
इश्क उनसे हुई कुछ ऐसी 
दीवाना बनाकर 
चलि गई 
हवा बनके वो आई कुछ ऐस 
और खुश्बु उडाकर 
चलि गई 
भरते रहे हम आह यहा पर 
सबको बिमार बनाकर 
चलि गई 
 
हरि पौडेल 
 
 

Leave a Reply