मुझको भी कोई तो गुनगुनाएगा

लिखने वाले ने लिखा मुझे
ये सोचकर
मुझको भी कोई तो गुनगुनाएगा
मंच की मल्लिका मैं बन ना सकी
कदरदान मुझको कोई मिल ना सका
तनहाईयों में जीती रही उम्र भर
उम्र सदियों सी मुझको लगने लगी
जिसने रचा था मुझे प्यार से
साथ उसने भी मेरा निभाया नही
लहरों सी उठती रही पर मगर
हाथ थामा किसी ने भी मेरा नही
तड़पती रही कसमसाती रही
जंग फिर भी मैं अपनी लड़ती रही
फिर हुई एक सुबह धूप खिलखिला उठी
चूम कर हाथ किसी ने फिर थामा मेरा

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