दोस्त हो जब दुश्मने-जाँ

दोस्त हो जब दुश्मन-ए-जाँ तो क्या मालूम हो
आदमी को किस तरह अपनी कज़ा मालूम हो

आशिक़ों से पूछिये खूबी लब-ए-जाँबख्श की
जौहरी को क़द्र-ए-लाल-ए-बेबहा मालूम हो

दाम में लाया है “आतिश” सब्जा-ए-ख़त-ए-बुतां
सच है क्या इंसा को किस्मत का लिखा मालूम हो

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