डर

डर
डर क्या है बाबूजी,
संासें थाम कर बैठना,
घड़ी की गति मति सुनना,
मन भन्ना जाना।
डर कैसे आता है-
दबे पांव,
या कि कोहराम मचाते हुए,
उठा पटक के साथ आता है डर?
विचार का डर-
हर घड़ी कौंधता रहता,
कि जैसे धुकनी की तरह चलती है सांसें,
कि बवंड़र के मानिंद।
डर में सपने कैसे आते हैं मास्टरजी-
जैसे कोई दबोच रहा हो गला,
भोंक रहा हो चाकू,
कुचल रहा हो सपने,
कैसे समाता है डर हमार ेअंदर?
निर्णय से पहले का डर-
फिर परिणाम का डर,
तिरस्कार का डर,
अपमान का डर,
किसिम किसिम के हैं न डर।
डर कितना भी बड़ा हो-
च्ूार चूर हो,
भरभराकर गिर ही जाता है,
जब खुद पर हो विश्वास,
अपने कर्म पर हो आस।