बहशी दरिंदे

बहशी दरिंदे

समाज में मानव को क्या हो गया

कितना बहशी वो हो गया

 डर उनसे कोसों दूर हो गया

लगता है पशु से भी बत्तर हो गया

मन उनका कुलमुला उठता

नित नया पाप करने को

कोई न कोई तरीका पनाने को

बेक़सूरों से ख़ुराफ़ात व कुकर्म करने को

अग्रसर हो गया भय से दूर हो गया

भूल गया पशु और पुरुष के भेद को

समझ में न आया उनके

इन कुकर्म के चक्कर में

जीवन तख्ती पे ताला डाल

गलत कामों के अंजाम पाल

दरिंदों ने इंसानियत छोड़ सारी सीमाएं तोड़

नारी की काया फोड़

बहशीपन की आग जला

नारी इज्ज़त पे खाख डाल

समाज में नारी को मजबूर किया

समय अब आगया

कलेजे को पत्थर कर

कलंकी जानवरों के नशे को उतार

तन के उनके टुकड़े कर

गिद्धों को खिला देना

भारत के दरिंदों में

भय दिलों में बसा देना

मौत मंडराती नज़र आए

कुकर्म की न सोच पाएँ

अभय उनका भय से भर जाय

रोम रोम काँप उठे

कुछ ऐसा करने को

डर के साये में जीने पर

मजबूर अब वे हो जाएँ

                              अनुज

 

 

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