भटकन…

कल रात, कोई आह सी जल रही थी।

जैसे, कोई शम्मा सी पिघल रही थी।

कई मरासिम से जैसे छूट रहे थे।

कुछ अपने, अपनों से रूठ रहे थे।

कुछ मदहोश लोग, होश की बातें कर रहे थे।

ज़ज्बे नहीं पर जोश की बातें कर रहे थे।

अच्छे लम्हे, बुरे लम्हों से शिकायत कर रहे थे।

कभी खुद से, कभी औरों से अदावत कर रहे थे।

लोगों में देखा बहोत रोष था।

फ़क़त कुछ ही दिनों का ये आक्रोश था।

हाँ! चले थे सभी रौशनी की तरफ,

पर वो जुगनू से ज्यादा कुछ नहीं था।

पर वो जुगनू से ज्यादा कुछ नहीं था।।

2 Comments

  1. abhiraj singh अभिराज 15/01/2013

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