ओ! समय ………

ओ! समय
ओ! समय के बदले चेहरे
क्रूरता में सना हुआ
लडा हर कौम को
ओ! दुर्भाग्य के जन्मदाता
भीड में तू चीरता चला
दरिंदगी की कहानी लिखी तूने
द्वापर से कलिकाल तक
कई बार
रुखी, बेजान धरा पर
नृशंस की काली आडी
तिरछी रेखाएँ खींच
खिंच गया तू
बह गया तू
ओ! समय के बदले चेहरे

बदले तूने प्यार के गीत
क्रन्दन हर जगह
टूटते स्वर में समाया विलाप
किया घोर चित्कार
पर न माना तू
लूटता रहा
मन के द्वंद्व सारे
मिट न सकेंगें
आज मानव को कहाँ
मानवी पथ का पता
वो अनजान कुपथ पर बढा जा रहा
कुछ नहीं समझ
समय
बढता गया
आज तक छलता गया……….
(सत्येन्द्र कात्यायन)

2 Comments

  1. यशोदा दिग्विजय अग्रवाल 14/01/2013

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