वक्त

हरी के हात मे

हरि थी केला !
उस दीन के हात मे
इस दिन भी ठेला !
एक तरफ उँची इमारत
दुसरी तरफ है खोली !
या खुदा! ये कौन सी
खेल तु ने खेला ?
कल तो बित गई
किसी तरह!
कौन जाने क्या होगा
कल का झेला ?
तेरी दिदार के लिए

निकला इस शहर से
ढुढते ढुढते
शहर हो गई अब
इस भीड मे
रह गया मै अकेला
जिस वक्त पैदा हुवे थे हम
घडी नही थी घर मे !
हसते थे ये लोग
रोना मेरे सुनके !
देखना जिस दिन रुकेगी
मेरी जीन्दगी कि घडी!
होगा यहाँ पर
रोनेका मेला !
हरि पौडेल 

 

 

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