हर कोई अपने हैं

हर कोई अपने हैं

अब केवल सपने हैं
दुःख सुख के साथी सब
गिनती में कितने हैं
झूठे हो याकि सच्चे
अजमाया किसने हैं
सीरत सबकी इक सी
अन्दर बाहर जितने हैं
नित चुनने से पहले
भरमाया सबने हैं
तट  मालिक बन बैठे
गोते खाय हमने हैं
पूछों उन परिंदों से
कब तक फल पकने हैं
देखों इन पेड़ो को
कपड़े नव पहने हैं
दिहली को मालुम है
दंगे कब रुकने हैं
हर कोई वाकिफ है
घर तोड़े रम ने हैं

 

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