जिंदगी के छंद

कविता व उपन्यास होती जिंदगी-
तो लगा लेते,
अनुप्रास,
उपमा,
श्लेष।
गढ़ लेते अपने पसंद के कोई और छंद।
मालिनी,
शिखरणी,
या वज्रतिलक,
लगा लेत बना लेते,
जीवन के मनोहर काव्य।
पर पर जिंदगी कहां होती है कविता-
जिसमें मनचाहा छंद लगा,
विहसते रहें ताउम्र।
जिंदगी उपन्यास क्या कहानी भी तो नहीं-
जिसमें पात्र,
घटनाएं सब के सब बस में हो रचनाकार के,
जिस पात्र से जो कराना चाहो,
बुलवाना चाहो,
वही के वही उगलेंगे।
कविता, कहानी या उपन्यास होती जिंदगी तो-
सब के सब वाकये होते पूर्वनियोजित,
अंत भी होता हमारी मर्जी के,
पर पर जिंदगी कथा नहीं,
जिंदगी महाकव्य है,
जिसमें कई अवान्तर काव्य,
कथाएं चलती रहती हैं समानान्तर,
एक ही समय में,
एक साथ।

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