पहली बार स्तब्ध नहीं हुयी है हवाएँ

हमारे साथ-
पहली बार स्तब्ध नहीं हुयी है हवाएँ
पहली बार भावुक नहीं हुआ है पूरा देश
पहली बार विवश नहीं दिखा है आम-आदमी
पहली बार-
हमारे चलने-फिरने-बोलने पर नहीं लगा है प्रतिबंध
पर-
पहली बार दिखा है जनता का ऐसा गुस्सा
और उस गुस्से से तिलमिलाता लोकतंत्र ।

अफसोस कि-
राजा-वजीर-सिपहसालार, सब के सब
अपनी-अपनी बेटियों की दुहाई देता रहा
मगर नहीं बचा सका
भारत की एक बेटी को … ।

सुना है –
पहली बार हमारे नेता
जनता की आँखों मे आँख डालने की स्थिति में नहीं है

शायद कुछ दिन और वे शरमाएंगे-
तब जाकर आँख मिलने की स्थिति में आ पाएंगे ।

*यह कविता  रवीन्द्र प्रभात के द्वारा उस समय लिखी गयी जब दिल्ली गैंग रेप की शिकार दामिनी (छद्म नाम) को न्याय दिलाने हेतु शांति पूर्वक  प्रदर्शन पर भी पुलिस और सरकार द्वारा रोक लगाई जा रही थी ।

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