मेरे हम उम्र उसपार के दोस्त-

मेरे हम उम्र उसपार के दोस्त-
कोफ्त नहीं होता,
जब कोई ,
इल्म के नाम पर,
लेता है तालीम भारत विरोधी दस्ते में शामिल होने को,
या निकलता है देश से,
बरबादी के इरादे से।
इल्म तो पाक है-
जिसे बांचें तो खुद मिलती है मुक्ति,
पर मेरे दोस्त,
जो काटते हैं सिर,
फोड़ते हैं बम,
इस पार,
कभी कोफ्त नहीं होती।
देखा पूरा देश एक स्वर में-
किया विरोध,
उस लड़की की खातीर,
सुना है उधर भी नौ साल की बच्ची…
पर दोस्त आपका खून जमा ही रहा,
मेरे घर आते हैं आपके बच्चे,
लिए हाथ में दोस्ती का दीया,
हम भी तो जाते हैं मन में आशा लिए,
कि तभी आपके भाई,
कर जाते हैं मिट्टी खराब,
उम्मीद की डोर बीच में ही टूट जाती है,
ज़रा सोचना मेरे हमउम्र दोस्त।

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