धर्म और कर्म

 भिष्मपितामहको ज्ञान था
 पाण्डव पर अन्याय हुवा
 पर कौरव के साथ रहना
भिष्मपितामह की विडम्बना थी
 वहि उनका  कर्म था
 वहि उनका धर्म था
अर्जुनकि  अस्मंजस्ता
उसकी अपनी विरक्ति थी
कोइ नही था दुश्मन वहा
रणभूमि भर सब अपनी थी
 पर क्षत्री का वहा धर्म था
युद्ध हि अर्जुन का कर्म था
 कृष्ण कि तब बाणी फुटी
 जन्म मृत्यु कि अर्थ खुली
हे अर्जुन!!
मुझ मे हि वेद पुराण है सब
मुझ मे हि संसार रही
मुझ से हि  ब्रह्माण्ड सुरु है
 मुझ मे हि सब अन्त  हुइ
हे अर्जुन!!
युद्ध हि तेरा धर्म है
युद्ध हि तेरा कर्म है
हरि पौडेल

 


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