दोस्त या मसीहा

लो आ गया फिर से मौसम जश्ने दोस्ती का,
अब दोस्तों की महेफ़िल मे हर शॅक्स को, बन ठन के जाना है,
पढ़ने है कसीदे यारों की यारी मे,
दोस्तों की ब्ज़्म मे, कुछ घूँट खुशियों के पी के आना है,
मगर, आज मे उस शॅक्स को खोजता हूँ
उसको कहूँ दोस्त, या मसीहा ही कहे दूं ये सोचता हूँ,
वो शॅक्स जो मुझको जीना सिखाता है,
तन्हाइयो मे जो खुद मुझको मुझसे मिलाता है,
जब मे डरता हूँ डूबने से,
मुझे दरियाँ का रास्ता दिखाता है, कूदने को भवर मे, देता है वास्ता अपना
और जब तैरता हूँ मजधार मे तो खींच कर साहिल पे लाता है,
वो शॅक्स जो बरसों पहेले भीड़ से उठ कर के आया था,
और हूँ भीड़ मे कितना अकेला मुझको बताया था,
जो अपना जान कर हाथ अपना बढ़ाता है,
और बेबस हूँ कितना उसके बिना, मुझे ये एहेसास कराता है,
उसकी रेहेबरि मे चलता हूँ कुछ खास बन के,
हो साथ तो चलता हूँ शायद कुछ और तन के,
ज़माने मे मेरी साख भी वो खुद ही बनाता है !
मगर अकेले मे आखों मे डाल कर आँखे, कुछ कहता है इस कदर,
अपनी ही नज़रों से खुद मुझको गिराता है,
मैने पढ़ा है उसकी आँखो मे, कि हूँ कॅम्ज़्र्फ भी ख़ुदग़र्ज़ भी,
उसकी बेखुदी की दवा भी हूँ और उसका “मर्ज़” भी,
उसके होने से चढ़ आया है, मुझ पर कुछ ओज भी,
और एक एहेसास ये भी, कि मुझपर है उसके किसी एहेसान का बोझ भी,
मेरी नियत के आईने से मुझको डराता है, मेरी ही रूह से खुद मुझको मिलता है,
मे मिला था अपने ख्वाब से उसके ही करम पर,
बुना एक ख्वाब, ख्वाब को हक़ीकत बनाने का उसके ही दम पर,
अब वो मुझको सच का करना सामना सिखाता है,
हर कदम पर मुझे मेरी हेसिअत का दर्पण दिखाता है,
मे सपनो मे एक दुनिया बासाता हूँ,
और उसमे ही बस मे रहेना भी चाहता हूँ,
मगर वो कुचल देता है मेरे सपनो के महल को,
सपनो की दुनियाँ से मुझे वो खींच लाता है,
और हक़ीकत की दुनियाँ मे मुझे जीना सिखाता है.
उसको कहूँ दोस्त, या मसीहा ही कहे दूं ये सोचता हूँ,
वो शॅक्स जो मुझको जीना सिखाता है,
तन्हाइयो मे जो खुद मुझको मुझसे मिलाता है!!!!!

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