अपने तईं तो हर घड़ी ग़म है

अपने तईं तो हर घड़ी ग़म है, अलम है, दाग़ है
याद करे हमें कभी कब ये तुझे दिमाग़ है

जी की ख़ुशी नहीं गिरो सब्ज़-ओ-गुल के हाथ कुछ
दिल हो शगुफ़्ता जिस जगह वो ही चमन है बाग़ है

किस की ये चश्म-ए-मस्त ने बज़्म को यूँ छका दिया
मस्ल-ए-हबाब सर नगुँ शरम से हर अयाग़ है

जलते ही जलते सुबह तक गुज़री उसे तमाम शब
दिल है के शोला है कोई, शमा है या चिराग़ है

पाईये किस जगह बता अये बुत-ए-बेवफ़ा तुझे
उम्र-ए-गुज़श्ता की तरह गुम ही सदा सुराग़ है

सैर-ए-बहार-ओ-बाग़ से हम को मुआफ़ कीजीये
उस के ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ से “दर्द” किसे फ़राग़ है?

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