मैं अनलहक हूँ…

मैं,

अनलहक* हूँ…

सच तो यही है,
ना, मानने की बात है।
दुनियां,
इसी बात से खफा होती है,
और कभी,
इसी बात को स्वीकार करती है;
उसकी मर्जी की बात है।
मन आया,
मान गया,
वगर-ना,
ज़हर का प्याला…
कभी सर कलम…
और कभी,
सूली पर लटका दिया…
और जब उसे,
अपनी इस करतूत से शांति मिल गयी;
तो बुत बनाया,
और शुरू कर दिया,
उसे,
पूजने का ढकोसलापन।।।
*अनलहक – मैं इश्वर हूँ।

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