पुकार प्रितम की

दूर कही शहर तेरी खुशबू आती रही

हम समझ ना सके वह हमसे दूर जाती रही

अब सोच कर क्या करे

जो वक्त हाथ से जाता रहा

तेरी ही बातो में

तेरी ही यादों में

हर पल ये दिल

तन्हा रहा दूर

भूलकर भी ना भूल पायेगें

तेरे साथ जो गुजरा जमाना रहा

वक्त वे वक्त राह पे

तेरी उम्मीदें बनाता रहा

उस पर तमन्नाओं की

स्याही लगाता रहा

दूर कही शहर तेरी खुशबू आती रही

हम समझ ना सके वह हमसे दूर जाती रही

जवां दिलो की धड.कन को

तुम समाले रही

हम ना समझ उस पर

ना समझी करते रहें

तुम समल कर आगे

चल दिये व अच्छा रहा

मर के भी गम रहेगा

फुरसत में तुम्हे सजा न सका

अब  आखें नम करके

क्या फायदा जो तुम्हे समझ ना सका

अब तक सोचते रह गये हम

तुम बदल गयी व अच्छा रहा

दूर कही शहर तेरी खुशबू आती रही

हम समझ ना सके वह हमसे दूर जाती रही

इस जनम के साथ में

तुम साथ ना रही

इस महोंबत का हमें

दिल से अफसोस रहा

उस पार जनम लेकें तुम्हें

मीत अपना बनाने का वादा रहा

नये लम्हों को लेकर

जीवन सजायेगें हम

सूरज की पहली किरण सी

मुझको दे दो ऐसा भांग ।

बगिया में खिल जायेगें फूल

वादे और कस्मों की दुनिया में

कभी नही होगें अब दूर

दूर कही शहर तेरी खुशबू आती रही

हम समझ ना सके वह हमसे दूर जाती रही !

 

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