कमजर्फ लम्हा

बड़ा ही खौफनाक निकला
मेरी नादानी का लम्हा
कमजर्फ लम्हा बन गया पल में ही
मेरी लाचारी का लम्हा

उस पल की कथा कैसे कहूँ
वो दर्द बयां कैसे करूँ
लुट रही थी आबरू मेरी और
सोया था ये सार जहां
कमजर्फ लम्हा बन गया हमकदम
मेरे अत्याचारी का लम्हा
बड़ा ही बेशर्म निकला
मेरी लाचारी का लम्हा

नजरें दे रही थी दुहाई इंसानियत के
बेखौफ साए बन गए थे वो हैवानियत के
आंशुओं की धार बहा ले जा रही थी
मेरे सारे सपनो की दुनिया
कमजर्फ लम्हा बन गया हमकदम
मेरे दुराचारी का लम्हा
बड़ा ही बेदर्द निकला
मेरी लाचारी का लम्हा – प्रीती श्रीवास्तव

4 Comments

  1. चिराग राजा 13/01/2013
  2. ganesh dutt ganesh dutt 31/01/2013

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