उसी चार- दीवारी में, अब भी कैद मैं रहती हूँ !

कहने को तो बहुत आगे बढ़ चुकी हूँ,

फिर भी जाने क्यों,
उसी चार- दीवारी में, अब भी कैद मैं रहती हूँ !

एक अरसा बीत गया,
उन लम्हों के जीते हुए,
पल भर की भी फुर्सत न हुई,
उसे एक नजर देखने के लिए,
फिर भी जाने क्यों,
इसी चाहत में जलती हूँ !
उसी चार- दीवारी में, अब भी कैद मैं रहती हूँ !

आ चुकी हैं दूरियां,
अब तुम्हारे हमारे दरमियाँ,
फिर भी जाने क्यों,
तुम्हे अपना कहने की, हसरत मैं रखती हूँ !

पलट कर भी कभी,
तुम्हारी ओर नहीं देखा,
फिर भी जाने क्यों,
उसी चार- दीवारी में, अब भी कैद मैं रहती हूँ !
-श्रेया आनंद
(25th Dec 2012)

2 Comments

  1. kaushlendra 10/01/2013
    • Shreya Anand Shreya Anand 20/01/2013

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