घडी कि सुई

घडी कि सुई 
वसन्त ऋतु आइ
कोकिल ने कुका
पतझड से बगिया
उजड़ना न छोड़ा
शराब  पिया और
शराबी हुवा मै
खुद शराब ने मुझे
पिना न छोड़ा
दिप जला
परवाने आए
शमा ने उसे
जलाना न छोड़ा
जानते थे वे
कि जल जाएंगे
परवाने फिर भी
जलना न छोड़ा
शायरी  किया
और शायर हुवा मै
सडको  पे चप्पल
घिसना न छोड़ा
मोहब्बत किया और
दिवाना हुवा मै
पर बेवफा ने दिल को
तोडना न छोड़ा
हम भी पडे
कब्र मे एक दिन
घडी कि सुई
फिर भी चलना न छोड़ा
हरि पौडेल 

 

2 Comments

  1. यशोदा दिग्विजय अग्रवाल 06/01/2013
    • Paudel Paudel 07/01/2013

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