अलबिदा

अलबिदा 

बुढे बृक्ष की कमजोर  डाल पर

फड फडा रहे है
पिले पिले पत्ते
अब तो ढल गया है सुरज
न जाने कब्
खो जाएगी यह दिन
रात के आगोश मे
पता हि न चला
कब्
चुपके से
धीरे धीरे खिसकता गया
कम्बख्त यह समय
जाने कैसे जम गइ
इस चेहरे मे भी
उमर की परत
पता हि न चला
वो हँसि कैसे बदल गई
इस बे जुंबा गम मे
जिन्दगि भर
मंजिल तो न मिलि
अब तो
मिलने हि वाली है
मौत कि इस दहलिज पर
बस
बाँकि रहगया है कहनेको
अलबिदा
हरि पौडेल 

 

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