रुख़्सत-ए-शबाब

ऐसा नहीं कि हम से मुहब्ब्त नहीं रहीं
जस्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही

सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं रहा
दिल पर वो धड़कनो की हुकूमत नहीं रहीं

कमज़ोर ये निगाह ने संजीदा कर दिया
जन्मों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रहीं

आँखो से तुम दिखाओगी या इल्तयाश में
दामन-ए-यार से कोई इस्मत नहीं रहीं

चेहरे पर झुर्रियों ने कयामत बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रहीं

अल्लाह जाने मौत कहा मर गई “खुमार”
अब मुझको ज़िन्दगी की ज़रूरत नहीं रही

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