उसे मर्दानगी कहते हैं !

कभी मुझे भारत माता कह,

मेरा स्वाभिमान बढ़ाते थे !

आज मेरी इज्ज़त से खेल,

अपनी हवस मिटाते हैं !

 

कभी मेरी लहू का तिलक लगा,

जान पर अपनी खेल कर,

मेरी हिफाज़त करते थे !

आज मेरा खून बहा,

प्यास अपनी बुझाते हैं !

 

गर्व से सदा ऊचा,

सिर मेरा ये रहता था,

ऐसी संतान है मेरी,

इस बात पर बेहिसाब फक्र था !

 

टूट गया वो अहम मेरा,

सिर झुक गया शर्म से,

सिसक उठा है रोम-रोम,

बेकल है हृदय-वन मेरा !

 

कल तलक जहाँ, वीर जन्म लेते थे,

हरा हर दुश्मन को,

माँ-बहनों की रक्षा किया करते थे,

आज वहां फक्त हैवानो का बसेरा है,

जो हवस की आग में,

दिन रात सुलगते हैं,

किसी को न माँ, न बहन समझते हैं !

 

बेरहमी से इंसानियत का गला घोट,

उसे मर्दानगी कहते हैं !

 

-श्रेया आनंद

(19th Dec 2012)

4 Comments

  1. abhiraj singh अभिराज 15/01/2013
    • Shreya Anand Shreya Anand 20/01/2013
  2. ganesh dutt ganesh dutt 25/01/2013
    • shreya 31/03/2013

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